औरंगाबाद शिक्षा विभाग में बड़ा खेल! क्लर्क ने खुद को समझ लिया DEO, फर्जी हस्ताक्षर से जारी किए आदेश

शिक्षक-शिक्षिका से रिश्वत लेकर काम करने का आरोप, मामला खुलने पर मचा हड़कंप; क्षेत्रीय शिक्षा उपनिदेशक ने किया निलंबित

औरंगाबाद | 11 अक्टूबर 2026

बिहार के औरंगाबाद जिला शिक्षा पदाधिकारी कार्यालय में कथित फर्जीवाड़े का एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है। आरोप है कि कार्यालय में तैनात एक निम्नवर्गीय लिपिक ने जिला शिक्षा पदाधिकारी (DEO) के अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए उनके नाम से फर्जी हस्ताक्षर किए और कार्यालय आदेश तक जारी कर दिए। मामला सामने आने के बाद मगध प्रमंडल के क्षेत्रीय शिक्षा उपनिदेशक ने आरोपी लिपिक को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया है।

क्या है पूरा मामला?

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, उत्क्रमित उच्च विद्यालय, चतरा के शिक्षक रवि रंजन कुमार ने योग्यता विस्तार के आदेश के लिए, जबकि राजकीय मध्य विद्यालय, पाली, नवीनगर की शिक्षिका गरिमा चौहान ने अपनी सेवा पुस्तिका पर हस्ताक्षर कराने के लिए जिला शिक्षा पदाधिकारी कार्यालय में आवेदन दिया था।

आरोप है कि कार्यालय में तैनात लिपिक अरविंद कुमार ने दोनों से रिश्वत लेकर शिक्षिका की सेवा पुस्तिका पर DEO के फर्जी हस्ताक्षर कर दिए। इतना ही नहीं, शिक्षक के योग्यता विस्तार की स्वीकृति के लिए भी कथित तौर पर DEO की जगह खुद हस्ताक्षर कर कार्यालय आदेश जारी कर दिया।

DEO ने मांगा स्पष्टीकरण, नहीं मिला जवाब

मामले की जानकारी मिलने के बाद जिला शिक्षा पदाधिकारी दयाशंकर सिंह ने संबंधित लिपिक से स्पष्टीकरण मांगा था। रिपोर्ट के मुताबिक, लिपिक ने स्पष्टीकरण का जवाब नहीं दिया। इसके बाद DEO ने मामले की जानकारी क्षेत्रीय शिक्षा उपनिदेशक को दी।

जांच पूरी होने तक निलंबन

मामले को गंभीरता से लेते हुए मगध प्रमंडल के क्षेत्रीय शिक्षा उपनिदेशक संजय कुमार चौधरी ने लिपिक को तत्काल प्रभाव से निलंबित करने का आदेश जारी किया है। जांच पूरी होने तक उसका मुख्यालय जिला शिक्षा पदाधिकारी कार्यालय, गयाजी निर्धारित किया गया है। विभागीय जांच के लिए संबंधित पदाधिकारियों को भी जिम्मेदारी सौंपी गई है।

सरकारी कार्यालयों में जवाबदेही पर सवाल

इस प्रकरण ने जिला शिक्षा पदाधिकारी कार्यालय में सरकारी दस्तावेजों की सुरक्षा, अधिकारियों के हस्ताक्षरों के सत्यापन और प्रशासनिक निगरानी को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं। अब विभागीय जांच में यह स्पष्ट होना बाकी है कि कथित फर्जी हस्ताक्षरों और आदेशों के मामले में किन-किन स्तरों पर लापरवाही हुई तथा आरोपों की पूरी सच्चाई क्या है।

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