औरंगाबाद। न्यायिक सख्ती का एक बड़ा उदाहरण सामने आया है। औरंगाबाद व्यवहार न्यायालय के सिविल जज (सीनियर डिवीजन-प्रथम) डॉ. दीवान फहद की अदालत ने डिक्री का अनुपालन नहीं किए जाने के मामले में औरंगाबाद समाहरणालय (कलेक्ट्रेट) को कुर्क (अटैच) करने का आदेश जारी किया है। अदालत ने नाजिर को निर्देश दिया है कि नियमानुसार कुर्की की कार्रवाई कर 15 दिनों के भीतर विस्तृत प्रतिवेदन न्यायालय में प्रस्तुत करें।
क्या है पूरा मामला?
यह आदेश एक पुराने निष्पादन वाद (Execution Case) में पारित किया गया है, जिसमें डिक्री धारक अधिवक्ता हरिकृष्णा प्रसाद को देय राशि का भुगतान लंबे समय से लंबित है। अदालत ने पाया कि पर्याप्त अवसर दिए जाने के बावजूद संबंधित विभाग द्वारा डिक्री की राशि का भुगतान नहीं किया गया।
अभिलेखों के अनुसार—
15 अक्टूबर 2025 को डिक्री धारक ने अनुपालन हेतु आवेदन दायर किया।
14 नवंबर 2025 को न्यायालय ने कारण बताओ नोटिस जारी किया।
इसके बाद 9 दिसंबर 2015 को अतिरिक्त कलेक्टर एवं जिला विधि शाखा से एक रिपोर्ट प्राप्त हुई, लेकिन उसमें भुगतान का स्पष्ट उल्लेख नहीं था।
सरकारी पक्ष की ओर से 11 दिसंबर 2025 और 5 फरवरी 2026 को समय की मांग की गई, परंतु इसके बावजूद डिक्री राशि अदा नहीं की गई।
अदालत की टिप्पणी
न्यायालय ने स्पष्ट कहा कि यह मामला “सबसे पुराने मामलों” की श्रेणी में आता है, जिनके शीघ्र निपटारे के लिए सर्वोच्च न्यायालय एवं उच्च न्यायालय द्वारा समय-समय पर दिशा-निर्देश जारी किए गए हैं। इसके बावजूद आदेश की अवहेलना गंभीर विषय है।
इन्हीं परिस्थितियों को देखते हुए अदालत ने समाहरणालय की संपत्ति को कुर्क करने का आदेश पारित किया है।
कुर्की का क्या मतलब?
कुर्की (Attachment) का अर्थ है—सरकारी या निजी संपत्ति को न्यायालय के आदेश से जब्त/अटैच करना, ताकि देय राशि की वसूली सुनिश्चित की जा सके। यदि निर्धारित समय में भुगतान नहीं होता है, तो अगला कदम नीलामी की प्रक्रिया हो सकता है।
सरकारी वकील बृजा प्रसाद सिंह के अनुसार, आदेश के बाद कलेक्ट्रेट की नीलामी प्रक्रिया शुरू की जा सकती है, हालांकि यह प्रक्रिया विधिसम्मत चरणों के बाद ही आगे बढ़ेगी।
आगे क्या?
नाजिर को 15 दिनों के भीतर कुर्की की कार्रवाई कर रिपोर्ट प्रस्तुत करनी है। मामले की अगली सुनवाई 9 मार्च को निर्धारित की गई है।
यह आदेश प्रशासनिक महकमे के लिए एक सख्त संदेश माना जा रहा है कि न्यायालय के आदेशों की अवहेलना किसी भी स्थिति में स्वीकार्य नहीं है।






